Part 3: Nature – Judge, Jury and Executioner

इस लेखनी की लेखिका पायल सिंह है। वो दिल्ली मे रहती है।

मनुष्य जब प्रकृति के गोद मे जन्मा, तब उसने अपने आप को खुबसुरत पहाड़ों, घाटियों और पेड़-पौधों से घिरा हुआ पाया; शायद तब उसने ये प्रण किया होगा कि वो इस सुंदरता पर कभी आँच नहीं आने देगा। प्रकृति ने भी मानव को माँ के समान प्यार दिया, सुरक्षा दी।

विश्वास नहीं होता ना? आगे पढ़ो।

तब प्रकृति को यह सपने मे भी नही सूझा होगा कि एक दिन, यही बालक, अपने ही माँ को मारने पे आ जायेगा।

जी हाँ, इतिहास गवाह है, हर उस क्षण का, जब मनुष्य, अपने ही स्वार्थ में वशीभूत होकर, प्रकृति को नुकसान पहुंचाने से नहीं कतराया है। मेरा और मेरी दोस्त, जो इस ब्लॉग की प्रधान लेखिका है, का यह मानना है कि, शायद मनुष्य को ये लगता है कि प्रकृति अमर-अजर है, और वो अपने आप को अनगिनत बार ठीक कर सकती है।

सच तो है, लेकिन… नीम हकीम खतरा जान, समझें?

नहीं? भाड़ा कौन भरेगा? मैं?

अब हम दोनों को तो शायद ये बताने की ज़रूरत नहीं कि हमने क्या-क्या कारनामे किए है…

नहीं जानते हो? अलेलेले, जाके थोड़ा चा पडाई कल लो।

जीवविज्ञान मे भी इस बात का प्रमाण हैं कि जब जब प्रकृति मे असामान्य असंतुलन आया है, तो भाड़ा चुकाने के चक्कर में हमेशा सर्वश्रेष्ठ जीव का ही भारी नुकसान होता है। हमारे पुर्वजों के पास मन तो था नहीं, फिर भी वो भुगतें।

अब सोचो हमारा क्या होगा; direct proportion लगाओ, दिमाग के साथ।

कहते है कि इंसान गलतियों से ही सिखता है, पर यहाँ तो हम मूर्खता की नयी सीमाएँ बिठा रहे है। पता नहीं अब तक कितनी बार भुगतान कर चुके हैं, पर सिखते ही नहीं।

क्योंकि प्रकृति मर रही है, इसलिए शायद उसने सोच लिया है – अगर मरना ही है, तो मारके मरेंगे!

पर, माँ है ना? इसलिए वो अब तक कोशिश किये जा रही है कि हमारी टेढ़े पूँछ को सीधा कर दे। याद रहे, हमें चेतावनी मिल रही है। अब ये युवा और नवयुवा पे निर्भर है कि वो कब इस बात को समझते है।

इसलिए अब आप लोग छेड़खानी पे उतर मत आना, वरना पता नहीं कब, यमराज के साथ चाय पीते नज़र आओगे।

आशा है, कि वो पूँछ, कुत्ते कि ना हो… कभी सीधी ही नही होती!

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